वे इन्हें देखकर कहने लगे अरे तु तो बहुत दिनो में आया है। मैं तो तेरी बांट देख रहा था। तभी भोले बालक जेठू ने उनके चरण पकड लिये। महात्मा जी बोले बच्चे तेरा क्या नाम है इन्होने नम्नता से उत्तर दिया बाबा मेरा नाम जेठू है। सब लोक मुझे इसी नाम से पुकारते हैं। उत्तर सुनकर महात्मा कहने लगे जेठू हमारी गाय को चराते तुझे कई दिन हो गए है। आज इसकी चराई लेते जाओ। जेठू जी ने हाथ जोडकर उनसे कहा महारज! मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे केवल आपका पवित्र आशिर्वाद चाहिए।
भक्त मन्दिर में गया वहां महन्त जी माला जप रहे थे। कुछ देर बाद वह भक्त फिर आया। महन्त जी से कहने लगा आपका चेला तो बडा मजाकिया है। गुरु महन्त जी बोले भक्त यह बच्चा ही तो है कह दिया होगा। बुरा न मानना तभी भक्त के जाने के बाद महन्त जी ने जेठू जी को अपने पास बुलाया और कहा अब एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती क्योंकि तुम्हारी शाक्ति मेरे से ज्यादा हो गई है। अतः यह स्थान तुम संभालो हम कहीं और चलते है। जेठू जी ने अपने गुरु महन्त जी से हाथ जोड जोडकर बडी नम्रता से कहा आप इस स्थान की शोभा बढ़ाँए। अपने गुरु के चरणों का स्पर्श करके हुडिया मन्दिर से ताजपुर आ गये।
यहाँ रहकर इन्होंने एक तालाब का निर्माण करवाया इसके पश्चात ताजपुर से चलकर खालडा आ गए। यहां रहकर इन्होने योग साधना की और एक जौंहड खुदवाया।
नसीबपुर गांव की एक महिला इनके लिए भोजन लेकर तथा इनके दर्शनों के लिए प्रतिदिन खालडा आती थी। एक दिन वह प्रतिदिन की भांति खालड़ा आ रही थी उस असहाय को रास्ते मे चार बदमाशों ने घेर लिया और दुर्वचन कहने लगे। तभी वह सभी दृष्टीहिन हो गये। जब वह भक्त महिला भोजन लेकर बाबा जेठू जी के पास पहुँची तो बाबा उससे बोले माई अब तो हम तेरे गांव चलकर ही भोजन करेंगे इतना कहकर बाबा उस श्रद्धालू महिला के साथ नसीबपुर आ गये। यही आकर उसके हाथ का भोजन ग्रहण किया।
नसीबपुर आकर इन्होंने तपस्या शुरु कर दी। कुछ समय पश्चात इन्हाने एक जौहड खुदवाना शुरु किया। हर रोज ये शाम को मजदूरों को उनकी मजदूरी दे दिया करते थे एक दिन उन मजदूरों के सामने ही धरती में से पैसे निकाल कर उनकी मजदूरी दे दी। कुछ मजदुरों के मन मे लोभ जाग गया। रात को खुदाई करके खजाने को खोजने लगे। लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा। दुसरे दिन जब शाम को जेठू जी बाबा ने उन मजदुरो की मजदूरी दुगनी कर दी। बाबाजी बोले भक्तों रात को तुमने बहुत काम किया था इसलिए दूगनी मजदूरी दे रहा हूँ। सब मजदूर जेठू बाबा के चरणों में गिर पडे और अपने अपराध के लिए क्षमा मांगने लगे। बाबा जी ने उनको उनकी अज्ञानता के कारण क्षमा कर दिया।
जेठू जी के पास भगवान नृसिंह जी की एक मूर्ति थी। उसकी पूजा का कार्यभार एक धर्मज्ञ विद्धान ब्राह्मण को सौप रखा था। गाँव नसीबपुर में जोहड़ बनवाने का काम चल रहा था। उन्हीं दिनों गांव के श्रद्धालु भक्तों ने आपस में निश्चय किया कि एक मन्दिर बनवाएं और वहां बाबा जी को लाएं। जोहड़ के साथ-साथ मन्दिर भी बनकर तैयार हो गया। गांव के सब नर-नारी बाबा जेठू जी को बडी श्रद्धा भाव से मन्दिर में ले आए। बाबा की प्रेरणा से भगवान नृसिंह जी की प्रतिमा की बड़ी धूम-धाम से प्राण प्रतिष्ठा कर दी गई।
बहुत दूर जब किसी सेठ की नाव नदी के अथाह जल में डूबने लगी तो वह बेचारे बहुत घबराये। तभी उनमें से एक व्यक्ति जो जेठू जी की दैवीय शक्ति को जानता था बोला नसीबपुर वाले जेठू बाबा को सच्चे मन से याद करो वही हम सबको नदी में डूबने से बचा सकते है। तब सेठ जी ने और साथ बैठे लोगों ने बाबा जी का स्मरण किया। इधर बाबा जी चौपड़ खेल रहे थे। तभी वे कहने लगे मेरी तबीयत ठीक नहीं है, मेरा पासा तुम फेंको। बाबा जी ने पास पड़ा कम्बल ओड़ लिया और नाव को किनारे पर लगा दिया।
जेठू बाबा जी को समाधि लिए दो सौ वर्ष से कुछ ऊपर हो गया है। यानी सम्वत (विक्रमी) १८४८ बावनी द्वादशी को ब्रहम मुहर्त में समाधी ली थी। जिस जौहड का निर्माण बाबा जी ने अपने पवित्र हाथों से करवाया था उसी जाँहड के किनारे बाबा ने जीवित समाधि ली थी।
बाबा जेठू जी की पवित्र समाधि पर प्रतिवर्ष भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन समस्त देश से असंख्य श्रद्धालू भक्तजन दरबार में आते हैं। और इस दिन बाबा की झाँकी बड़ी धूम-धाम से निकाली जाती है और द्वादशी के दिन शानदार मेले का आयोजन होता है। भक्तगण मंदिर में प्रसाद ग्रहण करते है। एकादशी को रात्रि को भजन कीर्तन होते है।
बाबा जेठू जी की पवित्र समाधि और मन्दिर के जीर्णोद्धार का कार्य सम्वत १९९२ में (विक्रमी) छिन्दवाडा (मध्यप्रदेश) वाले स्व. सेठ श्री शिवकरण दास ने किया था और मन्दिर की पूजा अर्चना का भार पं. सुन्दर दास जी को सौंपा गया था। आज भी पंडित सुन्दर दास जी के वंशज पूजा अर्चना कर रहे है।
श्री जेठू बाबा जी के जीवन के संबंध में जितना जान पाए उतना लिखा है, गलती के लिए क्षमा करे।